मंगलवार 13 अक्टूबर 2026 - 13:22
ईरान की शक्ति के प्रमुख कारक हैं क़ुरआनी शिक्षाएँ, जनशक्ति और आत्मनिर्भरता

हौज़ा / ईरान के पवित्र शहर क़ुम में ईश्वरीय गणनाओं के आधार पर दुनिया की पहली शक्ति’ विषय पर एक शैक्षिक एवं विश्लेषणात्मक बैठक आयोजित की गई। इसमें वक्ताओं ने कहा कि ईरान की शक्ति का आकलन केवल भौतिक संसाधनों और सैन्य क्षमताओं के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए ईमान, क़ुरआनी शिक्षाओं, जनता की एकता, आत्मनिर्भरता और ईश्वरीय नियमों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , ईरान के पवित्र शहर क़ुम में ईश्वरीय गणनाओं के आधार पर दुनिया की पहली शक्ति’ विषय पर एक शैक्षिक एवं विश्लेषणात्मक बैठक आयोजित की गई। इसमें वक्ताओं ने कहा कि ईरान की शक्ति का आकलन केवल भौतिक संसाधनों और सैन्य क्षमताओं के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए ईमान, क़ुरआनी शिक्षाओं, जनता की एकता, आत्मनिर्भरता और ईश्वरीय नियमों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

यह बैठक शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के कार्यालय में आयोजित हुई। इसमें हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मोहम्मद सादिक़ यूसुफ़ी मुक़द्दम, हौज़ा इल्मिया की सामाजिक अध्ययन समिति के प्रमुख और क़ुम की इस्लामिक आज़ाद यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन हसन ख़ैरी तथा हौज़ा इल्मिया के अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप-प्रमुख और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मोहम्मद रज़ा बरतेह ने भाग लिया।

वक्ताओं ने क़ुरआनी, सामाजिक, दार्शनिक और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से ईरान की शक्ति का विश्लेषण किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी देश की वास्तविक शक्ति को समझने के लिए उसके वैचारिक सिद्धांतों, जनता की एकता, सामूहिक इच्छाशक्ति और सभ्यतागत आधारों को भी महत्व देना चाहिए।

ईरान की शक्ति के प्रमुख कारक हैं क़ुरआनी शिक्षाएँ, जनशक्ति और आत्मनिर्भरता

क़ुरआनी शिक्षाएँ और ईश्वरीय नियम शक्ति के महत्वपूर्ण आधार

क़ुरआन एवं क़ुरआनी ज्ञान अनुसंधान केंद्र के प्रमुख हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन यूसुफ़ी मुक़द्दम ने शक्ति की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि भौतिकवादी विचारधाराओं में सैन्य शक्ति, आर्थिक संसाधनों और सॉफ्ट पावर जैसे कारकों के आधार पर किसी देश की ताक़त का आकलन किया जाता है। इसके विपरीत, क़ुरआनी दृष्टिकोण में भौतिक साधनों के साथ आध्यात्मिक और ग़ैबी कारकों को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

उन्होंने ईश्वरीय नियमों, अल्लाह की सहायता और सत्य की विजय का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज में परिवर्तन लाने के लिए आंतरिक सुधार, ईमान और दृढ़ता आवश्यक हैं। इस्लामी समाज को भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों क्षेत्रों में अपनी क्षमताओं को मज़बूत बनाना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि सैन्य शक्ति के साथ आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्थिरता भी प्रतिरोधक क्षमता के लिए आवश्यक है। आत्मनिर्माण, समाज के सुधार और सभ्यता के निर्माण में जनता की सक्रिय भागीदारी बुनियादी महत्व रखती है।

इस्लामी सभ्यता में शक्ति का उद्देश्य मानवता की सेवा

क़ुम की इस्लामिक आज़ाद यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन हसन ख़ैरी ने कहा कि इस्लामी सभ्यता में शक्ति का उद्देश्य दूसरों पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि सत्ता और अधिकारों के साथ मानवता की सेवा करना है।

उन्होंने इमामत और उम्मत के आपसी संबंध, जनता की राजनीतिक एवं सामाजिक समझ, आत्मनिर्भरता और सामूहिक इच्छाशक्ति को ईरान की शक्ति के महत्वपूर्ण कारक बताया।

उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य ब्रह्मांड की वास्तविकता को केवल इंद्रियों और बाहरी अवलोकनों तक सीमित कर देता है, तो उसके विश्लेषण अधूरे रह जाते हैं। क़ुरआनी शिक्षाओं के प्रकाश में शक्ति का सही विश्लेषण करने के लिए सृष्टि की व्यवस्था, ईश्वरीय नियमों और आध्यात्मिक कारकों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

उन्होंने क़ुरआन की इस आयत का उल्लेख किया:

“وَأَعِدُّوا لَهُمْ مَا اسْتَطَعْتُمْ مِنْ قُوَّةٍ”

अर्थात, और उनके मुकाबले के लिए अपनी क्षमता के अनुसार शक्ति तैयार रखो।

ईरान की शक्ति के प्रमुख कारक हैं क़ुरआनी शिक्षाएँ, जनशक्ति और आत्मनिर्भरता

उन्होंने कहा कि यह आयत बताती है कि शक्ति तैयार करने का अर्थ व्यापक है और इसे किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं किया जा सकता। इस्लामी समाज को भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों क्षेत्रों में अपनी क्षमताओं को विकसित करना चाहिए।

उन्होंने शक्ति, प्रतिष्ठा और सत्ता के दार्शनिक एवं अस्तित्वगत पहलुओं पर चर्चा करते हुए कहा कि इनका मूल्यांकन केवल बाहरी संसाधनों से नहीं, बल्कि इनके मूल स्रोतों को समझकर भी किया जाना चाहिए।

पैग़म्बरों का उद्देश्य इंसानों को अत्याचार से मुक्ति दिलाना था

हौज़ा ए इल्मिया के अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप-प्रमुख हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मोहम्मद रज़ा बरतेह ने कहा कि ईश्वरीय पैग़म्बरों का उद्देश्य प्रभुत्ववादी साम्राज्य स्थापित करना नहीं था, बल्कि इंसानों को अत्याचार और अपमान से मुक्ति दिलाना, उनका मार्गदर्शन करना और उनकी इच्छाशक्ति को मज़बूत बनाना था।

उन्होंने कहा कि इस्लामी सभ्यता की शक्ति का एक महत्वपूर्ण पहलू उम्मत की अवधारणा है। इसके अंतर्गत धार्मिक और वैचारिक संबंध भौगोलिक सीमाओं से आगे बढ़ सकते हैं।

उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान के प्रभाव को समझने के लिए उसके भौतिक संसाधनों के साथ वैचारिक, धार्मिक और सामाजिक क्षमताओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि प्रभुत्ववादी व्यवस्थाएँ भय और भौतिक इच्छाओं के माध्यम से इंसानों की इच्छाशक्ति को कमज़ोर करती हैं, जबकि पैग़म्बरी सभ्यता ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करती है, जिनमें चेतना, स्वतंत्रता और अपने निर्णय स्वयं लेने की क्षमता होती है।

ईरान की शक्ति के प्रमुख कारक हैं क़ुरआनी शिक्षाएँ, जनशक्ति और आत्मनिर्भरता

न्याय की स्थापना और मानव क्षमताओं का विकास शक्ति का उद्देश्य

बैठक के अंत में वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ईरान की शक्ति का व्यापक आकलन करने के लिए सैन्य एवं आर्थिक संसाधनों के साथ ईमान, आध्यात्मिकता, जनता की भागीदारी, आत्मनिर्भरता, सामूहिक इच्छाशक्ति और सभ्यतागत आधारों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि क़ुरआनी शिक्षाओं में शक्ति का उद्देश्य केवल विजय या प्रभुत्व हासिल करना नहीं, बल्कि न्याय स्थापित करना, इंसानों का मार्गदर्शन करना, अत्याचार का मुकाबला करना और मानवीय क्षमताओं का विकास करना है।

वक्ताओं ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि इस्लामी समाज के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आत्मनिर्माण, सामाजिक सुधार, जनएकता और सभ्यता निर्माण की प्रक्रिया को निरंतर आगे बढ़ाना आवश्यक है।

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